Wednesday, January 10, 2007

सीख लेते हैं लोग

शीशे की तरह टुट जाना हर ख्वाब का अंजाम है
मुरझा के गिर जाना हर फूल का अंजाम है
चीर देती हैं लहरें चट्टानों का भी सीना
सीख लेते हैं लोग गम के साये मे जीना
कर के आसुओं में दफन अपने दिल क अरमान को
लोग जीते हैं ऐसे जैसे जिंदगी पे एहसान हो
................................ Shubhashish(2001)

क्यों जिन्दगी को ऐसा बना दिया

क्यों मेरी जिन्दगी को ऐसा बना दिया
दुख के कफन में मुझे जिंदा जला दिया
मोहब्बत के ख्वाब में हकीकत जल गयी
सुकुन के ख्वाब मे सबकुछ गवां दिया
क्या रात और क्या दिन सब एक ही से लगते हैं
रोते-रोते तेरी याद में खुद खो भूला दिया
बीते पल का हिसाब रखते हैं नये पल गम ही देते हैं
बीते पल को ही खुद का नसीब बना दिया
.................................Shubhashish(2001)

कितना इन्तजार

इतना ना तडपाओ कि दर्द के भी आँसू छलक जायें
ये सजा मत दो प्यार मे कि हम दर्द की परिभाषा बन जायें
युँ जला कर, गम दे कर, तडपा कर,
इतना मत इन्तजार करवाओ कि आँखें समय का पैमाना बन जायें
......................................... Shubhashish(2000)

गर था ले रहा तु इम्तेहा

अब टुट के गिर गया हू
तो क्यों नहीं फिर उठा रहा
गर था ले रहा तु इम्तेहा तो
अब जीत का एहसास क्यों नहीं दिला रहा
हम तो हार गये
और कर रहे हैं इल्तजा
तो तु मेरे पास फिर
क्यों नहीं आ रहा

मेरी सासें हो रही हैं धीरे
खत्म हो रही है धडकन
क्यों नहीं तु मेरी
सदा सुन पा रहा
हम तो पागल से हो गये हैं
अपना सब कुछ गवां कर
अब क्यों नहीं
तु मुझे अपना रहा
............... Shubhashish(2000)

हमारा मुकद्दर

जिंदगी की परिस्थितियाँ मजबूर करतीं हैं अगर
तो आ छोड दे हम ये जहाँ
मिल जायें मौत से हम अगर
तो मौत ही होगी हमारा मुकद्दर
............................. Shubhashish(2000)

मुझे तेरी जरूरत है

इस कदर उबे हैं जिंदगी से कि अब खुद से नफरत है
सब कुछ लुटने के बाद भी दिल को अभी हसरत है
अभी भी इसे उम्मीद है कि तुझे पा लेगा ये
मेरी हर आह कहती है मुझे तेरी जरूरत है
............................................. Shubhashish(2000)

आसुओं सगं गुजरती रात

दर्द बन कर दफन हो गयी सीने मे हर बात
ना समझा सके हम अपनी मजबूरीयाँ और हालात
वक्त ने इस लायक भी नहीं छोडा की कोई शिकवा करें
बिन नींद आसुओं के सगं गुजरती है हर रात
.......................................... Shubhashish(2000)

मजबूरीयों में बधे

अश्क भी अब सहमें से पलकों मे छुपे रहते हैं
मेरी तरह ये भी तनहाई और घुटन सहते हैं
डरतें है कि कहीं देख ना ले इन्हे कोई
निकलना चाहते हैं पर मजबूरीयों में बधे रहते हैं
.........................................Shubhashish(1999)

Tuesday, January 09, 2007

कौन समझाये

जिसके लिये हमने हर खुशीयों को छोड दिया
उसने हमारी खशीयों के लिये हमें छोड दिया
उसे कैसे समझायें कि हमारी हर खुशी थी उससे
उसने अन्जाने मे हमारा दिल हमारे लिये ही तोड दिया
.......................................... Shubhashish(1999)

भीगी आँखें

आज भी आखें नम कर जाती हैं वो यादें
तडपा कर तन्हा कर जाती हैं वो बातें
उस समय की मुस्कान आज हमारी हंसी उडाती है
बस तुझे ही पुकारती हैं हमारी सहमी और भीगी आँखें
...................................................... Shubhashish(1999)

नजराना

अब तक तेरे प्यार मे सिर्फ गम ही मिले हैं
पर तेरा नजराना समझ उसे दामन में कैद किये हैं
आँसु जो बेताब हैं आखो से निकलने के लिए
उसे प्यार की निशानी मान आँखों मे रोके हुये हैं
............................................... Shubhashish(1999)

तुझे पाने कि तमन्ना

करवटें बदलते रहते हैं लेकिन नींद नही आती
आखों क सामने बस तु ही तु छा जाती
समझाया हमने भी बहुत अपने दिल को लेकिन
तुझे पाने कि तमन्ना दिल से निकल ही नही पाती
............................................Shubhashish(1999)

कुछ मजबूरीयाँ

करते है तुझसे प्यार बहुत फिर भी कुछ ना कहते हैं
है खबर तुझे क्या कि किस तरह हम दर्द दिल का सहते हैं
कुछ मजबूरीयाँ हैं जिससे हैं बाहुत मजबुर से हम
वरना तुझे बतला देते कि कैसे दिल मे रहते हैं
...............................................Shubhashish(1999)

गुमसुम सी तनहाइयों मे

गुमसुम सी तनहाइयों मे जैसे कोई छू जाता है
अपने यहीं पे होने का एहसास दिलाता है
तडप उठता है बेचैन दिल तुम से मिलने के लिये
आँसु आँखों मे छूपाये फिर सहम जाता है
..............................Shubhashish(1998)

चांद की जगह तेरा चेहरा

कितना अच्छा होता जो चांद की जगह तेरा चेहरा आता
रात मे भी आकाश में दिन से ज्यादा उजाला छा जाता
मेरी ये आँखें न सुखती बिन तेरे तुझे देखते के लिये
रात को बेचैन होने के बजाय तेरी आँखों में ही खो जाता
......................................Shubhashish(1998)

पुकारा तो साथ दे देगे

कभी तुमने पुकारा किसी राह पर तो साथ दे देगे
कभी किया तुमने जो इशारा तो जान दे देंगे
जान से भी ज्यादा चाहेंगे तुम्हे हमेशा और हमेशा
पर कभी चाहकर भी अब तझे आवाज ना देंगे
.......................................Shubhashish(1998)

बेताब धडकन

कुछ कहना तो चाहा था निगाहों ने
पर दर्द रह गया था बस इन आहों में
इन्तजार मे बेताब है एक-एक धडकन
चाहता हूँ फिर मिलूँ जिंदगी की राहों में
.................................................Shubhashish(1998)

सपना क्यों

क्यों होता है एहसास दुखों का
दिल का भारी बोज नही होता हल्का
दिल क्यों देखता है ऐसा सपना सुख का
जो बन जाता है दुखडा ही दिल का

...........................................Shubhashish(1998)

वक्त पर एहसान

तेरे बिना जीना वक्त पर एहसान है
तुझ बिन ये जिंदगी दो पल की मेहमान है
तुझे देखने से आँखों मिलता है सुकून
तुझ पे निसार तो हमारी जान है
.................................. Shubhashish(1998)

नजदीकी का एहसास

मन को है तुझे देखने की प्यास
तूझ बिन बेचैन है मेरी हर एक सांस
उस एक क्षण के लिए छोड॰ सकता हूं ये जहाँ
जिस पल मे हो तेरी नजदीकी का एहसास
............................................. Shubhashish(1998)